दर्द : लिखित : विनय मिश्र "पथिक"
================ दर्द ======================= दर्द-ए-जुल्म की इंतहा को सब्र का बाँध बना डाला । ज़ज्बात-ए-दरिया मैं लब को छोड़ आखों को अपना पैगाम-ए- साहिल बना डाला । वास्ता-ए-जूनून था जिनसे कभी वफ़ा-ए-आग के तफ्सीस मे राख बना डाला । रौशनी थी जिसके सुरत पर कोयले की कालिख ने मैला बना डाला । गुरुर नहीं है अब उनसे जिनके है इतने सितम यहाँ पायसे-ए-लब की दास्ता भी खत्म वहाँ जिनकी मोहब्ते-ए-शान मैं गुनेहगार हमें बना डाला |। चन्द अल्फाज़ो ने ता उम्र का नासूर चहरे पर निशान बना डाला उन्हंी लोगो के बीच मैं वफादार को बेकिरदार बना डाला || होने वाले थे जिनके हम शरीके-हयात तीर-इ-नीकच बना डाला अपनों और गेरो से अब क्या शिकायत जिन पर था ऐतबार उनके तोहमतों को भी अपना बना डाला || सपने थे जिनके साथ तवज्जो दी थी जिनको कभी आज गीले आखों मैं भी उनकी तस्वीर बना डाली ॥ ================ दर्द ======================= लिखित : विनय मिश्र "पथिक" ©copyright by Vinay Mishra