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मन ही मन की बाते, बाकी सब ज्ञान --- लिखित - विनय मिश्र

मन ही मन की बाते  बाकी सब झूठा कितनी सच्ची कितनी बुरी  अपनी समझ ही समझदारी बाकी सब दुनियादारी  मन ही मन की बाते, बाकी सब है ज्ञान।  बाते करते है वह राजनीत की जो बनती जा रही बीमारी  जिसमे हम अवल हिंदुस्तानी  मन ही मन की बाते, बाकी सब है ज्ञान।  हर कोई दे रहा अपना ज्ञान  झूठी राजनीत मैं फसा आम इंसान  खेल खिला रही है सभी पार्टिया  कभी यहाँ कभी वहाँ सत्ता लोभ का, कभी धन बल का  देश हित का न है कोई सरोकार  बस मन ही मन की बाते, बाकी सब परोपकार।  बैठा लिया है हमने मन मै राष्ट्र का ज्ञान जिसका हम सभी को नहीं है रति भर ज्ञान समाज की समझ है दोगली  अपना दुःख सच्चा, बाकि सब झूठा एक धृतराष्ट्र भी भीष्म पर भारी वही यह हिन्दुस्तान है  बस मन ही मन की बाते, बाकी सब धनवान |  राह कठिन है देशवासियो  आधार कमजोर, अस्तित्व - भूख - की है लड़ाई  खतरा नजदीक और हम बेहपरवाह  हित की खोज मैं हो रहे गुमशुदा  बकाया खाता, बाकी लोकाचार है भाषण का  दू...

जिए जा रहा हूँ: लिखित : विनय मिश्र "पथिक"

=====  जिए जा रहा हूँ ===== राह देखता हूँ, फिर उसी के जिनके लिए साँसे चलती थी ना बोलते हुए भी याद किया करती थी अब तोह खुछ भी नहीं , न ना और ना हां छोड़   भी   दिया   कहा   पर , जहां   पर   कोई   नहीं   अपना खाली   हाथों   पर   बस   तस्वीर   झलकती   है सपनो   से   बस   यादें   और   दर्द   झकलते   हुए जिए   जा   रहा   हू   बस, राह   देखते   हुए   जिए   जा   रहा   हूँ , तक़दीर   मैं   तुम्हे   पाने   के   लिए  ,  बस   लड़ता   जा   रहा   हूँ,  जिए   जा   रहा   हूँ! =====  जिए जा रहा हूँ ===== लिखित :  विनय मिश्र " पथिक " --> ©copyright by Vinay Mishra

दर्द : लिखित : विनय मिश्र "पथिक"

================ दर्द ======================= दर्द-ए-जुल्म की इंतहा को सब्र का बाँध बना डाला । ज़ज्बात-ए-दरिया मैं लब को छोड़ आखों को अपना पैगाम-ए- साहिल बना डाला । वास्ता-ए-जूनून था जिनसे कभी वफ़ा-ए-आग के तफ्सीस मे राख बना डाला । रौशनी थी जिसके सुरत पर कोयले की कालिख ने मैला बना डाला । गुरुर नहीं है अब उनसे जिनके है इतने सितम यहाँ पायसे-ए-लब की दास्ता भी खत्म वहाँ जिनकी मोहब्ते-ए-शान मैं गुनेहगार हमें बना डाला |। चन्द अल्फाज़ो ने ता उम्र का नासूर चहरे पर निशान बना डाला उन्हंी लोगो के बीच मैं वफादार को बेकिरदार बना डाला || होने वाले थे जिनके हम शरीके-हयात तीर-इ-नीकच बना डाला अपनों और गेरो से अब क्या शिकायत जिन पर था ऐतबार उनके तोहमतों को भी अपना बना डाला || सपने थे जिनके साथ तवज्जो दी थी जिनको कभी आज गीले आखों मैं भी उनकी तस्वीर बना डाली ॥ ================ दर्द ======================= लिखित : विनय मिश्र "पथिक" ©copyright by Vinay Mishra

जस्बात.... लिखित : विनय मिश्र "पथिक"

================जस्बात======================= क्या करे हर कोई सिर्फ उल्फत-ए-हज़ूर ही करते है । एक उम्र के  बाद वही खाली बैठ कर तनहाइ-ए-गम मैं वो सिर्फ हुस्न-ए-जिक्र  ही करते मिलते है । उनकी ख़ुशी सिर्फ इंतज़ार-ए-दर्द मैं होती है , और सिर्फ हुस्न-ए-दीदार , उनकी आखरी जनाज़े-ए-वक़्त की टाकिज होती है । हम  भी  चल  रहे   है  उसी राह-ए-मंजिल की तरफ जहा पर आपको भी आना है हमारी जनाजे-ए-रुक्सत के बाद दो आसूओ-ए-दर्द और दो फूल-ए-नवाज़ अदा करने वो भी हमारे सजदे मैं , हमारे  मजार-ए-शरीफ मैं तस्लीम करने ...। ================जस्बात======================= लिखित : विनय मिश्र "पथिक" ©copyright by Vinay Mishra

सुन ले फ़रियाद मेरी मौला... लिखित : विनय मिश्र "पथिक"

सुन ले एक फ़रियाद मेरी मौला अर्जी ये मेरी स्वीकार कर ले मौला मेरे  बस आरज़ू इतनी सी है सुन ले वो फ़रियाद मेरी कही भी , किसी से भी  .. बस  मेरे मौला .. एक झलक , एक महक , एक दुआ और एक पल भी , बैठ कर  बितायु,  मैं भी, उसके साथ.. बस इतनी सी तमन्ना कर दे पूरी मेरे मौला .. हर एक जगह , हर एक समय , हर एक दिशा मैं , दिखती है वोह , राहों मैं, सायो मैं, सांसों मैं , झलकती है वो तमनाओं मैं बहे .. इस कदर ... इसी बहाने... कही से ... एक झलक दिखला दे .. मेरे मौला .. बस इतनी सी मुराद .. पुरी कर  दे मेरे मौला .. ख़ुशी और गम .. सभी है मेरे साथी .. राते होती लम्बी, तारे करते है बाते मुझसे ,  उसकी दिन अब कटते नहीं ... दुआए भी रुकती नहीं ... सजदे मैं तेरे और उसके ..मौला ए मेरे मौला .. सुन ले फ़रियाद ये ..मेरे मौला .. वोह भी करे मुझसे बाते सपनो मैं ही भले कही पर तड़प मेरी धड़कन मेरी प्यास मेरी  कही से देख ले ..वो ए मेरे मौला बस आरज़ू इतनी सी सुन ले वो  फ़रियाद मेरी मौला कबूल कर ले  वो ..  सुन ले यह फ़रियाद मेरी मौला अर्जी ये मेरी स्वीकार कर ले ए मौला मेरे  ...

हमारे मन मैं.... लिखित : विनय मिश्र "पथिक"

कुछ तो है हममे . कुछ तो है इस समय मैं कुछ तो है इन बातो मैं कुछ तो बाकी है हमारे मन मैं रास्तो को धुन्दों मन मैं झाकू या फिर उन पलो को खोजू जिसमे , कुछ तो महसूस करते है हम .. दूरिया ही  दूरिया  है तकलीफ भी है कही  , दर्द ही साथी है यहाँ  लफ्ज़ कह नहीं सकते है धड़कन कहती भी कहा है तब भी , कुछ धुंद सा है हमारे मन मैं. रेत की तरह सांसे , चलती है हमारी, जज्स्बात समजते है , आखे हमारी , क्यों है , पर्दा फिर भी है हमारे दिलो मैं ठहराव सा है , सूरज भी मध्यम सा है आवाज़ को गति की इच्छा है इंतज़ार मैं कान है पर कुछ छाव सा भी है  हमारे मन मैं आज सामने है , धड़कन भी है तेज़ है , मन की आखे छुटी है तन को , आवाज़ देती है आसू , तब भी , कुछ तो द्वंध है हमारे मन मैं कुछ तो है हममे . कुछ तो है इस समय मैं कुछ तो है इन बातो मैं कुछ तो बाकी है हमारे मन मैं लिखित : विनय मिश्र "पथिक" ©copyright by Vinay Mishra

कशमकश मैं घिरा हु आज ... लिखित : विनय मिश्र "पथिक"

कशमकश मैं घिरा  हु  आज ... लहरों से हु घिरा , किनारों की तलाश मैं हु आज  ... बूंद बूंद मैं तड़पता हु मैं क्या जीने की तलाश मैं हु आज... लहमे लहमे , पल हर एक पल मैं , क्यों नहीं जीता मैं हु आज हर पल एक बेचनी  है नजाने कितनी उदासी है जीहवा भी साथ न देती है अब जीवन के सात रंग भी ... बेरंग है , इसी कशमकश मैं... आज पतझड़ का मोंसम , कड़ाके की ठण्ड है , पसीनो से तर मैं, घबराकर खड़ा हुआ मैं आज... क्या साथी , क्या जमाना कौन अपना , कौन पराया किसका सिखा , किसने सिखाया  क्या ख़ुशी ,और  क्या गम कदमो से लड़खडया  , हर पल  डरा हु मैं.. हु मैं आज ... कशमकश मैं घिरा  हु  आज ... किनारों की तलाश मैं हु आज  ... बूंद बूंद मैं तड़पता हु मैं क्या जीने की तलाश मैं हु आज... लम्हे लम्हे , पल हर एक पल मैं , क्यों नहीं जीता मैं हु आज अब है सामने किनारा लहरों से बाहर है कुछ ज़िन्दगी बेजान सी है , या फिर परेसान सी है जेसी भी है यह है मेरी उल्ज्ही हुई  ज़िन्दगी  है  आज हर लम्हे मैं डूबती हुई मेरी ज़िन्दगी ....