कशमकश मैं घिरा हु आज ... लिखित : विनय मिश्र "पथिक"

कशमकश मैं घिरा  हु  आज ...
लहरों से हु घिरा ,

किनारों की तलाश मैं हु आज  ...

बूंद बूंद मैं तड़पता हु मैं
क्या जीने की तलाश मैं हु आज...

लहमे लहमे , पल हर एक पल मैं ,
क्यों नहीं जीता मैं हु आज

हर पल एक बेचनी  है
नजाने कितनी उदासी है
जीहवा भी साथ न देती है अब

जीवन के सात रंग भी ...
बेरंग है , इसी कशमकश मैं... आज

पतझड़ का मोंसम ,
कड़ाके की ठण्ड है ,
पसीनो से तर मैं,
घबराकर खड़ा हुआ मैं आज...

क्या साथी , क्या जमाना
कौन अपना , कौन पराया
किसका सिखा , किसने सिखाया 
क्या ख़ुशी ,और  क्या गम
कदमो से लड़खडया  , हर पल
 डरा हु मैं.. हु मैं आज ...

कशमकश मैं घिरा  हु  आज ...


किनारों की तलाश मैं हु आज  ...
बूंद बूंद मैं तड़पता हु मैं
क्या जीने की तलाश मैं हु आज...
लम्हे लम्हे , पल हर एक पल मैं ,
क्यों नहीं जीता मैं हु आज

अब है सामने किनारा
लहरों से बाहर है कुछ ज़िन्दगी
बेजान सी है , या फिर परेसान सी है
जेसी भी है यह है मेरी उल्ज्ही हुई  ज़िन्दगी  है  आज

हर लम्हे मैं डूबती हुई मेरी ज़िन्दगी ..
किस्तों किस्तों मैं बिखरी
सब्दो मैं उल्ज्ही है, किनारों मैं बिखरी पड़ी ,

ऐसी जिंदगी से क्या सोचता हु मैं आज .......

कशमकश मैं घिरा  हु  आज ...

लिखित : विनय मिश्र "पथिक"

©copyright by Vinay Mishra

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