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Showing posts from June, 2012

सुन ले फ़रियाद मेरी मौला... लिखित : विनय मिश्र "पथिक"

सुन ले एक फ़रियाद मेरी मौला अर्जी ये मेरी स्वीकार कर ले मौला मेरे  बस आरज़ू इतनी सी है सुन ले वो फ़रियाद मेरी कही भी , किसी से भी  .. बस  मेरे मौला .. एक झलक , एक महक , एक दुआ और एक पल भी , बैठ कर  बितायु,  मैं भी, उसके साथ.. बस इतनी सी तमन्ना कर दे पूरी मेरे मौला .. हर एक जगह , हर एक समय , हर एक दिशा मैं , दिखती है वोह , राहों मैं, सायो मैं, सांसों मैं , झलकती है वो तमनाओं मैं बहे .. इस कदर ... इसी बहाने... कही से ... एक झलक दिखला दे .. मेरे मौला .. बस इतनी सी मुराद .. पुरी कर  दे मेरे मौला .. ख़ुशी और गम .. सभी है मेरे साथी .. राते होती लम्बी, तारे करते है बाते मुझसे ,  उसकी दिन अब कटते नहीं ... दुआए भी रुकती नहीं ... सजदे मैं तेरे और उसके ..मौला ए मेरे मौला .. सुन ले फ़रियाद ये ..मेरे मौला .. वोह भी करे मुझसे बाते सपनो मैं ही भले कही पर तड़प मेरी धड़कन मेरी प्यास मेरी  कही से देख ले ..वो ए मेरे मौला बस आरज़ू इतनी सी सुन ले वो  फ़रियाद मेरी मौला कबूल कर ले  वो ..  सुन ले यह फ़रियाद मेरी मौला अर्जी ये मेरी स्वीकार कर ले ए मौला मेरे  ...

हमारे मन मैं.... लिखित : विनय मिश्र "पथिक"

कुछ तो है हममे . कुछ तो है इस समय मैं कुछ तो है इन बातो मैं कुछ तो बाकी है हमारे मन मैं रास्तो को धुन्दों मन मैं झाकू या फिर उन पलो को खोजू जिसमे , कुछ तो महसूस करते है हम .. दूरिया ही  दूरिया  है तकलीफ भी है कही  , दर्द ही साथी है यहाँ  लफ्ज़ कह नहीं सकते है धड़कन कहती भी कहा है तब भी , कुछ धुंद सा है हमारे मन मैं. रेत की तरह सांसे , चलती है हमारी, जज्स्बात समजते है , आखे हमारी , क्यों है , पर्दा फिर भी है हमारे दिलो मैं ठहराव सा है , सूरज भी मध्यम सा है आवाज़ को गति की इच्छा है इंतज़ार मैं कान है पर कुछ छाव सा भी है  हमारे मन मैं आज सामने है , धड़कन भी है तेज़ है , मन की आखे छुटी है तन को , आवाज़ देती है आसू , तब भी , कुछ तो द्वंध है हमारे मन मैं कुछ तो है हममे . कुछ तो है इस समय मैं कुछ तो है इन बातो मैं कुछ तो बाकी है हमारे मन मैं लिखित : विनय मिश्र "पथिक" ©copyright by Vinay Mishra

कशमकश मैं घिरा हु आज ... लिखित : विनय मिश्र "पथिक"

कशमकश मैं घिरा  हु  आज ... लहरों से हु घिरा , किनारों की तलाश मैं हु आज  ... बूंद बूंद मैं तड़पता हु मैं क्या जीने की तलाश मैं हु आज... लहमे लहमे , पल हर एक पल मैं , क्यों नहीं जीता मैं हु आज हर पल एक बेचनी  है नजाने कितनी उदासी है जीहवा भी साथ न देती है अब जीवन के सात रंग भी ... बेरंग है , इसी कशमकश मैं... आज पतझड़ का मोंसम , कड़ाके की ठण्ड है , पसीनो से तर मैं, घबराकर खड़ा हुआ मैं आज... क्या साथी , क्या जमाना कौन अपना , कौन पराया किसका सिखा , किसने सिखाया  क्या ख़ुशी ,और  क्या गम कदमो से लड़खडया  , हर पल  डरा हु मैं.. हु मैं आज ... कशमकश मैं घिरा  हु  आज ... किनारों की तलाश मैं हु आज  ... बूंद बूंद मैं तड़पता हु मैं क्या जीने की तलाश मैं हु आज... लम्हे लम्हे , पल हर एक पल मैं , क्यों नहीं जीता मैं हु आज अब है सामने किनारा लहरों से बाहर है कुछ ज़िन्दगी बेजान सी है , या फिर परेसान सी है जेसी भी है यह है मेरी उल्ज्ही हुई  ज़िन्दगी  है  आज हर लम्हे मैं डूबती हुई मेरी ज़िन्दगी ....

बिन तेरे ... लिखित : विनय मिश्र "पथिक"

देखे थे जो सपने रह गए वो सुने , बिन तेरे ... हर तरफ थी जिनकी तस्वीरे, महकती थी जिनसे राते, आज ख़ुशी के मौसम मैं भी , अब लगते अधूरे, बिन तेरे .. सौगाते लाती थी मुस्कान जो तेरी यादो मैं रह गयी है अब वो अकेली खामोसी का चल रहा है अब सिनसिला ... बिन तेरे वो रह गया , जो मेरा ... देखे थे जो सपने रह गए वो सुने , बिन तेरे ... क्या उम्मीद थी क्या जस्बात थे क्या वो सपने थे जिनके अरमान हमारे मन मैं थे सपनो के इस दुनिया मैं रह गये वो अकेले , बिन तेरे ..   देखे थे जो सपने रह गए वो सुने , बिन तेरे ... समां था जो ख़ुशी का , उल्लास का खुशबू थी जिसमे , महक भी थी , वोह प्यार की यादों की इस महफ़िल मैं , शिकवो की इस बेमानी दुनिया मैं रह गये अधूरे ... और हम भी रह गये अधूरे .. बिन तेरे .. देखे थे जो सपने रह गए वो सुने , बिन तेरे ... लिखित : विनय मिश्र "पथिक" © copyright by Vinay Mishra  

अब जरा सा : लिखित : विनय मिश्र "पथिक"

यह धुँआ है जो यादो का बर्दास्त नहीं होता अब जरा सा यह जोह हवा सा साया, खोया खोया सा है अब जरा सा लह्मो लह्मो मैं कुछ छुपा है कुछ थमा सा भी है अब जरा सा हर एक पल इशारे करते हर ख़ुशी गायब सी लगती है अब जरा सा कुछ नया करने की चाह है अब कुछ कर गुजरने की आस है अब रात का अँधेरा .. अब छटने को है अब जरा सा सुन अब सबकी आरज़ू तुह, दुआ को भी कबुल कर अब जरा सा रखती है यादे दिया जो सबने गाते है सभी इनको इंतज़ार मैं , अब जरा सा सब कुछ की आशा करते है मन मैं जिज्ञासा रखते है लबो पर शिकवे , दिलो मैं आग है  अब जरा सा .... बदलने को अगसर कुछ करने को , या सोचने को मजबूर है हम .. अब जरा सा ... लिखित : विनय मिश्र "पथिक" ==================== © copyright by Vinay Mishra