बिन तेरे ... लिखित : विनय मिश्र "पथिक"

देखे थे जो सपने
रह गए वो सुने ,
बिन तेरे ...

हर तरफ थी जिनकी तस्वीरे,
महकती थी जिनसे राते,
आज ख़ुशी के मौसम मैं भी ,
अब लगते अधूरे,
बिन तेरे ..

सौगाते लाती थी
मुस्कान जो तेरी
यादो मैं रह गयी है
अब वो अकेली
खामोसी का चल रहा है
अब सिनसिला ...
बिन तेरे वो रह गया ,
जो मेरा ...

देखे थे जो सपने
रह गए वो सुने ,
बिन तेरे ...

क्या उम्मीद थी
क्या जस्बात थे
क्या वो सपने थे
जिनके अरमान हमारे मन मैं थे
सपनो के इस दुनिया मैं रह गये
वो अकेले , बिन तेरे ..
 
देखे थे जो सपने
रह गए वो सुने ,
बिन तेरे ...

समां था जो ख़ुशी का , उल्लास का
खुशबू थी जिसमे , महक भी थी , वोह प्यार की
यादों की इस महफ़िल मैं ,
शिकवो की इस बेमानी दुनिया मैं
रह गये अधूरे ...
और हम भी रह गये अधूरे .. बिन तेरे ..

देखे थे जो सपने
रह गए वो सुने ,
बिन तेरे ...

लिखित : विनय मिश्र "पथिक"


©copyright by Vinay Mishra




 

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