अब जरा सा : लिखित : विनय मिश्र "पथिक"

यह धुँआ है जो यादो का
बर्दास्त नहीं होता
अब जरा सा

यह जोह हवा सा साया,
खोया खोया सा है
अब जरा सा

लह्मो लह्मो मैं कुछ छुपा है
कुछ थमा सा भी है
अब जरा सा

हर एक पल
इशारे करते
हर ख़ुशी
गायब सी लगती है

अब जरा सा
कुछ नया करने की चाह है अब
कुछ कर गुजरने की आस है अब

रात का अँधेरा ..
अब छटने को है
अब जरा सा

सुन अब सबकी
आरज़ू तुह,
दुआ को भी कबुल कर
अब जरा सा

रखती है यादे
दिया जो सबने
गाते है सभी इनको
इंतज़ार मैं , अब जरा सा

सब कुछ की आशा करते है
मन मैं जिज्ञासा रखते है
लबो पर शिकवे , दिलो मैं आग है
 अब जरा सा ....

बदलने को अगसर
कुछ करने को , या सोचने को
मजबूर है हम .. अब जरा सा ...


लिखित : विनय मिश्र "पथिक"

====================
©copyright by Vinay Mishra

Comments

Popular posts from this blog

नींद ..., लिखित : पथिक

सागर ऍव मानव ...., लिखित :- पथिक ...

सुन ले फ़रियाद मेरी मौला... लिखित : विनय मिश्र "पथिक"