हमारे मन मैं.... लिखित : विनय मिश्र "पथिक"

कुछ तो है हममे .
कुछ तो है इस समय मैं
कुछ तो है इन बातो मैं
कुछ तो बाकी है हमारे मन मैं

रास्तो को धुन्दों
मन मैं झाकू
या फिर उन पलो को खोजू
जिसमे ,
कुछ तो महसूस करते है हम ..

दूरिया ही  दूरिया  है
तकलीफ भी है कही  , दर्द ही साथी है यहाँ 
लफ्ज़ कह नहीं सकते है
धड़कन कहती भी कहा है
तब भी ,
कुछ धुंद सा है हमारे मन मैं.

रेत की तरह सांसे ,
चलती है हमारी,
जज्स्बात समजते है ,
आखे हमारी ,
क्यों है ,
पर्दा फिर भी है हमारे दिलो मैं

ठहराव सा है , सूरज भी मध्यम सा है
आवाज़ को गति की इच्छा है
इंतज़ार मैं कान है
पर
कुछ छाव सा भी है  हमारे मन मैं

आज सामने है ,
धड़कन भी है तेज़ है ,
मन की आखे छुटी है तन को ,
आवाज़ देती है आसू ,
तब भी ,
कुछ तो द्वंध है हमारे मन मैं


कुछ तो है हममे .
कुछ तो है इस समय मैं
कुछ तो है इन बातो मैं
कुछ तो बाकी है हमारे मन मैं


लिखित : विनय मिश्र "पथिक"

©copyright by Vinay Mishra

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