जस्बात.... लिखित : विनय मिश्र "पथिक"
================जस्बात=======================
क्या करे हर कोई सिर्फ
उल्फत-ए-हज़ूर ही करते है ।
एक उम्र के बाद वही
खाली बैठ कर
तनहाइ-ए-गम मैं
वो सिर्फ हुस्न-ए-जिक्र ही करते मिलते है ।
उनकी ख़ुशी सिर्फ इंतज़ार-ए-दर्द मैं होती है ,
और सिर्फ हुस्न-ए-दीदार ,
उनकी आखरी जनाज़े-ए-वक़्त की टाकिज होती है ।
हम भी चल रहे है उसी
राह-ए-मंजिल की तरफ
जहा पर आपको भी आना है
हमारी जनाजे-ए-रुक्सत के बाद
दो आसूओ-ए-दर्द और दो फूल-ए-नवाज़ अदा करने
वो भी हमारे सजदे मैं ,
हमारे मजार-ए-शरीफ मैं तस्लीम करने ...।
================जस्बात=======================
लिखित : विनय मिश्र "पथिक"
©copyright by Vinay Mishra
क्या करे हर कोई सिर्फ
उल्फत-ए-हज़ूर ही करते है ।
एक उम्र के बाद वही
खाली बैठ कर
तनहाइ-ए-गम मैं
वो सिर्फ हुस्न-ए-जिक्र ही करते मिलते है ।
उनकी ख़ुशी सिर्फ इंतज़ार-ए-दर्द मैं होती है ,
और सिर्फ हुस्न-ए-दीदार ,
उनकी आखरी जनाज़े-ए-वक़्त की टाकिज होती है ।
हम भी चल रहे है उसी
राह-ए-मंजिल की तरफ
जहा पर आपको भी आना है
हमारी जनाजे-ए-रुक्सत के बाद
दो आसूओ-ए-दर्द और दो फूल-ए-नवाज़ अदा करने
वो भी हमारे सजदे मैं ,
हमारे मजार-ए-शरीफ मैं तस्लीम करने ...।
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लिखित : विनय मिश्र "पथिक"
©copyright by Vinay Mishra
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