यादे ...लिखित : - पथिक .
मैंने उसे रोते हुए देखा ,
अश्क बहाते हुए देखा ,
हर एक बूंद मे बबेसी नज़र आई ,
ना जाने वोह आज केसे तड़प आई ,
-----------------------------------
अश्क की धारा थी ,
की वोह ज़िन्दगी की बेबसी ,(गमो का सागर ).
जेसे हर एक बूंद मैं ,
कह रही थी अपना एक जीवन ,
-----------------------------------------
मैंने उसे रोते देखा , अश्क बहाते देखा ....
------------------------------------------
फूट फूट के अश्क बहते थे ,
हम बे बेबस उन्हें देखते थे ,
आसुओं के इस महासागर में ,
मानो कई दरध झलकते थे ,
जेसे हर एक बूंद मैंने ,
टूटता था उनका सयम...,
क्योकि वोह हमारे सामने ,
अचानक से आई थी .....
---------------------------------------
रहा गया ना हमसे ,
दुह्विधा थी कहे केसे ,
फिर भी , मन को समझाकर ,
कहे झुम्ले , किसी तरह ,
उनको हसाने के लिए , गुध्गुधाने के लिए ,
गम दुह्विधा , जो भी था भुलाने के लिए ,
शायद दर्द कुछ जयादा था ,
गम का वोह भी एक पैमाना था ,
पेमाना छलकता था .. अश्क रुकता ना था ...
और मोहतरमा ... ,
ने हमे . ..................
ने हमे .....................
आँसू ही तोहफे मैंने दिए ..........
--------------------------------------------
मैंने रोते हुए देखा .. अस्ख बहाते देखा ............
-------------------------------------------------
रहुन्दा हुआ गला , दबी जुबा ........
रहुन्दा हुआ गला , दबी जुबा
क़र रही थी कुछ बयान ...
हर एक शब्ध , मानो
एक तिलीएस्म बाया करता था ...
-------------------------------------------------
वोह भीगी आखे , आज भी प्रश्न पूछती ...
वोह भीगी आखे , आज भी प्रश्न करती ....
वोह अश्क आज भी ...
एक अभूज पहेली है ...
-------------------------------------------
ना जाने कहाँ से आये और कहाँ खो गयी ....
ना जाने कहाँ से आई .... और कहाँ खो गयी
और वोह रोते हुए , और वोह अश्क बहाते
कहाँ ग़ुम हो गयी ....
------------------------
मैंने रोते हुए देखा .. अश्क बहते देखा ............
-------------------------------
धूमिल है जिसके निशा अब ...
मालूम नहीं ...
वो खा है अब ...
अश्क ही अश्क थे जिनके पास ......
अश्क ही अश्क थे जिनके पास ..
और ................
और ...............
बेबस --- खड़े थे हम ,... उनके पास ....
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लिखित : - पथिक .........................
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अश्क बहाते हुए देखा ,
हर एक बूंद मे बबेसी नज़र आई ,
ना जाने वोह आज केसे तड़प आई ,
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अश्क की धारा थी ,
की वोह ज़िन्दगी की बेबसी ,(गमो का सागर ).
जेसे हर एक बूंद मैं ,
कह रही थी अपना एक जीवन ,
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मैंने उसे रोते देखा , अश्क बहाते देखा ....
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फूट फूट के अश्क बहते थे ,
हम बे बेबस उन्हें देखते थे ,
आसुओं के इस महासागर में ,
मानो कई दरध झलकते थे ,
जेसे हर एक बूंद मैंने ,
टूटता था उनका सयम...,
क्योकि वोह हमारे सामने ,
अचानक से आई थी .....
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रहा गया ना हमसे ,
दुह्विधा थी कहे केसे ,
फिर भी , मन को समझाकर ,
कहे झुम्ले , किसी तरह ,
उनको हसाने के लिए , गुध्गुधाने के लिए ,
गम दुह्विधा , जो भी था भुलाने के लिए ,
शायद दर्द कुछ जयादा था ,
गम का वोह भी एक पैमाना था ,
पेमाना छलकता था .. अश्क रुकता ना था ...
और मोहतरमा ... ,
ने हमे . ..................
ने हमे .....................
आँसू ही तोहफे मैंने दिए ..........
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मैंने रोते हुए देखा .. अस्ख बहाते देखा ............
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रहुन्दा हुआ गला , दबी जुबा ........
रहुन्दा हुआ गला , दबी जुबा
क़र रही थी कुछ बयान ...
हर एक शब्ध , मानो
एक तिलीएस्म बाया करता था ...
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वोह भीगी आखे , आज भी प्रश्न पूछती ...
वोह भीगी आखे , आज भी प्रश्न करती ....
वोह अश्क आज भी ...
एक अभूज पहेली है ...
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ना जाने कहाँ से आये और कहाँ खो गयी ....
ना जाने कहाँ से आई .... और कहाँ खो गयी
और वोह रोते हुए , और वोह अश्क बहाते
कहाँ ग़ुम हो गयी ....
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मैंने रोते हुए देखा .. अश्क बहते देखा ............
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धूमिल है जिसके निशा अब ...
मालूम नहीं ...
वो खा है अब ...
अश्क ही अश्क थे जिनके पास ......
अश्क ही अश्क थे जिनके पास ..
और ................
और ...............
बेबस --- खड़े थे हम ,... उनके पास ....
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लिखित : - पथिक .........................
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©copyright by Vinay Mishra
awsome... great poem.. keep it up .. simply superb. How do u manage to write so nicely ?
ReplyDeletevery good keep it up.
ReplyDeletegrate poem. good to read and keep writing
ReplyDeletegud mr. vinay.... keeep it up....
ReplyDeleteGood work on the poems. Keep up the good writing.
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