मैं कैसे, .. इन पलो को याद ..... रखु....By पथिक ..

ख़ुशी  के  लम्हों को खोजता हु
पर दर्द ही नज़र आते है
याद करता हु उन पलो को
तोह आँखे भर आती है
एहसास भी नहीं ,
परछाई भी नहीं साथी ,
समय का भी नहीं ध्यान
फिर कैसे ,
इन आते जाते पलो को  समेतू...........
मैं कैसे, .. इन पलो को याद रख़ू.........
मैं कैसे, .. इन पलो को कैसे बिसरू .........

सुखी आँखों ,
मैं भी है बहुत नज़ारे ..
उन  नजारो मैं भी ,
तलासता हु ,
उन पलो को मैं
याद आने से रहे वोह पल,
जोह सेमेटी है इन आँखों मैं,
अनेकोओ कहानिया दर्द की...
सुनाती बाते , लबो से है ।

मैं कैसे, .. इन पलो को याद रख़ू.........
मैं कैसे, .. इन पलो को कैसे बिसरू .........

दोस्त भी मिले मुझे हज़ार,
उनका भी वास्ता था सिर्फ दर्द से था अनेक..
खुसी भी जैसे महरूम थी अब मुझसे
कैसे मैं याद  रखु, याद करू , वोह हसी के पल
हर एक पल मैं होता है दर्द मुझे
बाते भी पहुचाती थी दर्द मुझ तक ..
  
मैं कैसे, .. इन पलो को याद रख़ू.........
मैं कैसे, .. इन पलो को कैसे बिसरू .........

जीवन को कसे दू ,
एक नया आयाम ,
जीवन को जो दे एक नया आयाम
मैं भी याद रख सकू असे पल ,
कह सकू मैं दासता-ऐ -ख़ुशी ,
इज़हार कर  सकू ऐसी मस्ती
सायद ऐसे पल दूर है बहुत ,
और मेरा जीवन ,
एक नाव की कश्ती की तरह ,
किनारों की तलाश करती है !
सायद ऐसे पल,
मेरे जीवन मैं .... कभी आ भी पाए ... उम्मीद भी नहीं अब ऐसे पलो की ...

मैं कैसे, .. इन पलो को याद रख़ू.........
मैं कैसे, .. इन पलो को कैसे बिसरू .........
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आपका .....
........पथिक .....
©copyright by Vinay Mishra
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Comments

  1. hum b kabi kavitanye likhte the magr itni sundarta se nahi ..
    well done boy..

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  2. Superb poem...Bahut khoobsurati se shabdon ka prayog kiya hai.Keep it up man!!!

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  3. bahot sahi likhi hai ye kavita. Jada to kavitake bare mein janate nahi hum, lekin padhane ke baad samaj mein aa gayi. :D

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